मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

एक पत्र पटाखों के नाम


प्यारे पटाखो

सादर फटस्ते!

आजकल तुम सब बहुत खुश होगे कि दीवाली को कुछ ही दिन शेष बचे हैं। तुम्हारा मन दीवाली के दिन मिल-जुल कर फट-फूट कर धमाका करने को बेताब हो रहा होगा। हालांकि अभी कुछ ही दिन बीते हैं रावण और उसके पारिवारिक बंधुओं के अंजर-पंजर को पटाखों द्वारा फटे हुए किन्तु तुम्हारे भीतर की फटकर धमाका करने के इच्छा अपनी प्रवृत्ति अनुसार दिनों-दिन बलवती होती जा रही है

जब तुम सब धमाका कर फूटोगे-फटोगे, जलोगे-मरोगे तो फैलाओगे ध्वनि प्रदूषण जो सुनने की शक्ति क्षमता से होगा कई गुना अधिक। जिस प्रकार ढोल को हद से अधिक पीटने से वह फट जाता है उसी प्रकार कईयों के कान के परदे भी तुम्हारे धमाकों की तेज ध्वनि को सुनकर तार-तार हो जायेंगे। तुम्हारी कृपा से अनेकों ज़हरीली गैसें उत्पन्न होकर वायुमंडल को अपने शिकंजे में जकड़ लेंगी और वायु प्रदूषण को उन्नत शिखर पर पहुंचा देंगी। फिर वायु प्रदूषण द्वारा जनता को उच्च रक्त चाप, हृदयघात, दिमागी असंतुलन व दमे जैसी अनेक बीमारियाँ उपहार में दे दी जाएँगी। तुम्हारे फटने से आकाश में जो कोहरा जमा होगा उससे कुछ या बहुत सारी दुर्घटनाएं होगी जो कईयों का जीवन लील जायेंगी।

खैर चाहे जो भी हो लोग तो दीवाली की खुशियाँ मनाएंगे ही। उन्हें इन सब बातों से क्या लेना कि तुम्हें बनाने के लिए जबरन बाल-मजदूरी करवाई जाती है व बच्चों को ऐसी विपरीत परिस्थितियों कार्य करना पड़ता है कि बेचारे अनेक गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं और समय से पहले ही इस संसार को राम-राम कह कर यमलोक चले जाते हैं। तुम्हें बनाने वाले कई कारखाने आग लगने के कारण जलकर स्वाहा हो चुके हैं और साथ स्वाहा हो गये सभी मासूम बाल मजदूर भी। किन्तु क्या फर्क पड़ता है ऐसी छोटी-मोटी दुर्घटनाएं तो देश में होती ही रहती हैं।

अब लोगों के पास पैसा है तो खर्च करेंगे ही। साल में रो-धो कर एक ही तो धमाकेदार त्यौहार दीवाली आता है उसमें भी पटाखों न चलायें तो जीने का क्या मजा। इसी ख़ुशी में एक रात में कई-कई टनों पटाखे फूंक देते हैं जो कई करोड़ों के आते हैं। ये सब जानते हुए भी कि अपने देश की आबादी में कितने ही गरीब ऐसे भी हैं जिनका दीवाली पर दिवाला ही निकला रहता है और वो बेचारे भूखे पेट ही इस त्यौहार को मनाने को विवश होते हैं।

पटाखे जी तुम सब इस दिन शरारत भी कर लेते हो। कभी रॉकेट के रूप में किसी घर को लंका की भांति जला कर राख कर देते हो तो कभी बम के रूप किसी का हाथ जला डालते हो। भईया तुमसे एक शिकायत तो हमें भी है। लगता है तुमने भी पूंजीवादी व्यवस्था की चादर ओढ़ ली है जो गरीबों की ऐसी-तैसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हो। अब तुम पूछोगे। कैसे? तो भईया सुनो। गरीब बेचारा तो वैसे ही आधा पेट भूखा रहकर कुपोषण की मार झेल रहा है ऊपर से तुम फटकर अपने जहरीले धुंए से उसको नई-नई बीमारियाँ सप्लाई करते जा रहे हो।

अमां यार! यदि तुम्हें फटने का इतना ही शौक है तो जाकर भ्रष्टाचारियों के काले धन के भण्डार में जाकर फटो और जलाकर राख कर दो उस काली कमाई को जो गरीबों के खून को चूस-चूस कर जमा की गई है। तुम्हारे ऐसा करने से भ्रष्टाचारियों की आत्मा ऐसा कांपेगी कि वो भ्रष्टाचार करने से पहले दस बार तुम्हारा स्मरण करेंगे। तब हम सब भी कहेंगे कि तुम भी क्या खूब फटे।

वैसे मंहगाई ने तुम्हें फुस्स करने की पूरी योजना बना ली है किन्तु तुम्हें फोड़ने के शौक़ीन दीवानों की कृपा से इस दीवाली को भी तुम फटोगे। हालांकि हमारे द्वारा तुम्हारे फटने के चांस बिलकुल नहीं हैं। इस बार अपनी दीवाली जगमगाते दीयों संग, तुम्हें न फोड़ने का संकल्प लिए व माँ लक्ष्मी के चरणों की वन्दना करते हुए ही मनेगी।

बाकी फिर कभी...

4 comments:

  1. बहुत अच्छी बात ... दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें... हैप्पी दीपावली..

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. आपको गोवर्धन व अन्नकूट पर्व की हार्दिक मंगल कामनाएं,

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

यहाँ तक आयें हैं तो कुछ न कुछ लिखें
अच्छा लगे अच्छा जो लगे बुरा तो बुरा लिखें.