साधु महाराज रिमझिम बारिश में धरती से निकल रहे पानी के बुलबुलों को देखकर काफी देर से मुस्करा रहे थे. उनके इस प्रकार के आचरण को देखकर उनके पैर दबा रहे शिष्य ने उनसे पूछा, "महाराज क्या बात है? आज आप इतना क्यों मुस्करा रहे हैं? अरे ऐसी कोई बात नहीं है शिष्य. बस ऐसे ही कुछ पुरानी बातें याद आ गईं." साधु महाराज ने बात टालते हुए कहा. शिष्य बोला, "महाराज कोई न कोई विशेष बात अवश्य है जिसे आप अपने प्रिय शिष्य से छुपाने का प्रयास कर रहे हैं." साधु महाराज ने बात टालने का बहुत प्रयास किया किन्तु शिष्य जब हठ करने लगा तो वह बोले, ''देखो तुम मेरे सबसे प्रिय शिष्य हो और मेरे पुत्र समान ही हो. सो तुमसे क्या छिपाना किन्तु ध्यान रहे यह बात हम दोनों के सिवा आश्रम में किसी के कानों में न पड़े." शिष्य ने स्वीकृति में सिर हिलाया. साधु महाराज बीते दिनों को याद करते हुए बताने लगे, "कई साल हो गए संन्यास लेने से पहले मैं एक लुटेरा था. एक दिन मैंने एक व्यापारी को लूट कर उसकी हत्या कर दी थी तो उस समय बिलकुल ऐसा ही बारिश का मौसम था और धरती से पानी के बुलबुले निकल रहे थे. वह व्यापारी मरते हुए मुझसे बोला था कि एक दिन ये पानी के बुलबुले ही मुझे मेरे किये की सजा दिलायेंगे. बस उसकी उसी बात को सोचकर ही मुस्करा रहा था कि इतने साल बीत गये और मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया." साधु महाराज की बात समाप्त होते ही उनके शिष्य ने छुपी पिस्तौल निकालकर साधु महाराज की दायीं कनपटी पर लगा दी और बोला, "महाराज उस व्यक्ति द्वारा कहा गया वचन आज सत्य निकला किन्तु आपने जुर्म स्वीकारने में पूरे दस वर्ष लगा दिये. मैं हूँ सी.बी. आई. इंस्पेक्टर विजय शर्मा. यू आर अंडर अरैस्ट."
वाह …………सही का जीवन पानी का बुलबुला ही है और किया कर्म सामने जरूर आता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुन्दर !
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर संदेश..
प्रत्युत्तर देंहटाएंसी बी आई इतनी फालतू है? तभी देश का यह हाल है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut badiya
प्रत्युत्तर देंहटाएंDownload Free Songs
अब फ़ौरन ही इंस्पेक्टर विजय शर्मा को आरूषि मर्डर केस का चारज थमा दिया जाए ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंभईया जी इश्माईईईईईईईईल :)
वंदना जी, संगीता तोमर, नव्या के पंकज त्रिवेदी जी, अर्चना जी, अजीत गुप्ता जी, सोनल शर्मा जी एवं भाई अजय कुमार झा आप सभी का सुन्दर टिप्पणियों के आभार...
प्रत्युत्तर देंहटाएंअजीत गुप्ता जी ने नाराजगी जताई कि सी.बी.आई. को लघु कथा में फालतू काम में लगा दिया गया तो उनसे विनम्र प्रश्न है कि क्या वास्तव में यह फालतू कार्य था? किसी इंसान की हत्या होने पर उसे सज़ा दिलवाने के लिए यदि सी.बी.आई. इंस्पेक्टर विजय शर्मा ने इतने दिन शक के आधार पर साधू महाराज (जो कि ढोंगी था) के आश्रम में टिककर हत्या की गुत्थी सुलझा दी तो क्या यह प्रश्नीय कार्य नहीं है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंभाई अजय कुमार झा आरुषि हत्याकांड की पृष्ठ भूमि आप भी भली भाँति जानते हैं फिर इंस्पेक्टर विजय शर्मा को क्यों कष्ट दिया जाए. इतने साल की मेहनत के बाद उन्हें आराम की सख्त जरूरत है... भैया जी इश्श्माइल :)
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुमित जी
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक सीबीआई वाला 10 वर्ष तक एक केस के पीछे अपना भेष बदलकर रहे, अब आप ही सोचिए कि यह कितना व्यवहारिक है? यदि इस देश में ऐसा होता तो आज सब तरफ अमन-चैन ही होता। यदि आपको आपत्ति है तो आप मेरी बात को खारिज कर दें, पाठक तो अपनी प्रतिक्रिया दे ही सकते हैं, जो उन्हे उचित लगता हो।
अजित गुप्ता जी नमस्ते! आपने मेरी लघु कथा को पढ़कर प्रतिक्रिया दी इसके लिए आभार. मेरी बात को कृपया अन्यथा न लें. इस लघु कथा के माध्यम से मैंने यह सन्देश देने का प्रयास किया था कि किये की सज़ा एक न एक दिन अवश्य मिलती है. वैसे भी यह सत्य घटना पर आधारित लघु कथा है. आशा है आप अपनी दया दृष्टि मेरी प्रत्येक रचना पर रखेंगी. एक बार फिर से आपका आभार...
प्रत्युत्तर देंहटाएंबुरे काम का बुरा ही नतीजा होता है ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंधन्यवाद मोनिका जी
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